Tuesday, 26 September 2017

नज़्म -कौन हूँ मैं

नज़्म -कौन हूँ मैं

उफ़क़ के सूरज की लालिमा ने
मुझे बताया की कौन हूँ मैं
मुझे ख़बर ही नहीं थी अब तक
मैं अपने होने से बेखबर थी
ख़बर में रखता था वो जो मुझको
वो मेरा मोहसिन चला गया है
उफ़ुक़ से आगे की सैर करने
मैं आज तनहा खड़ी हुई हूँ
ये सोचती हूँ पलट के आये
वो जैसे कोई हवा का झोंका
मेरे बदन को असीर करके
मुझे बताएँ की आ गया हूँ
मैं मुंतज़िर हूँ न जाने कब से
उसी के आने की कोई आहट
कभी तो मुझको सुनाई देगी
कभी तो मंज़िल दिखाई देगी

सिया सचदेव

Sunday, 7 May 2017

ऐसा लगता है इबादत को चले आते हैं

जब भी हम तेरी ज़ियारत को चले आते हैं
ऐसा लगता है इबादत को चले आते हैं

बस दिखावे की मुहब्बत को चले आते हैं
लोग रस्मन भी अयादत को चले आते हैं

देखकर आपको इस दिल को क़रार आ जाए
अपनी आँखों की ज़रुरत को चले आते हैं

जब भी घबराने सी लगती है तबीयत अपनी
ऐ ग़ज़ल हम तिरी ख़िदमत को चले आते हैं।

हम फकीराना तबियत हैं हमें क्या लेना
लोग बेवज्हा सियासत को चले आते हैं।

गज़ब दुनिया के हमने ढंग देखे

बदलते ज़िंदगी के रंग देखे
गज़ब दुनिया के हमने ढंग देखे

वफाये, प्यार ,नफरत बेवफाई
कई मौसम तुम्हारे संग देखे

ज़माने से बहुत लड़ता है इन्सां
कभी खुद से भी करके जंग देखे

नए इस दौर के बच्चों की बाते
जिसे सुनकर बड़े भी दंग देखे

बड़ी बाते किया करते हैं जो लोग
वोही दिल के निहायत तंग देखे
नक़ाब उनके थे कितने खूबसूरत
मगर चेहरे बहुत बदरंग देखे

ज़िंदगी तू कहाँ ठहरती है

ख़ुद की हस्ती गिरां गुज़रती है
ज़िंदगी जब मज़ाक करती है

रास्ते कब तमाम होते हैं
ज़िंदगी तू कहाँ ठहरती है

ये मोहब्बत भी है कली की तरह
ख़ुद ही खिलती है खुद बिखरती है

रक़्स करता है कोई ज़ेहन पे जब
शायरी तब कहीं उतरती है

ऐसी रानाई किसने मानी जो
आईना देख कर सँवरती हैं

रौब इतना हैं उसके चेहरे पर
आँख उठते हुए भी डरती है

मुझमें ख़ामी जो ढूँढता है फ़क़त
उसको ख़ूबी मिरी अखरती है।

ज़िन्दगी हैं अजीब सी कश्ती
डूबती है न जो उभरती है

उस जुबां का सिया भरोसा क्या
अपने वादे से जो मुकरती है

मुझे पाने की ख़्वाहिश मत करो तुम

कोई मुझसे गुज़ारिश मत करो तुम
मुझे पाने की ख़्वाहिश मत करो तुम

तुम्हारे दिल में क्या है जानती हूँ
मोहब्बत की नुमाईश मत करो तुम
नतीजे पर बहुत अफ़सोस होगा
वफ़ा की आज़माइश़ मत करो तुम

बिछड़ना ही है जब अंजाम अपना
क़रीब आने की कोशिश मत करो तुम

मैं इक मुद्दत से भूली मुस्कुराना
नयी इक और साज़िश मत करो तुम

बढूँगी क़ाबलियत से ही अपनी
मेरी कोई सिफ़ारिश मत करो तुम

मेरी खुद्दारियों पर आँच आये
कोई ऐसी नवाज़िश़ मत करो तुम

रोने लगे वो दर्द की तफ़्सीर देख कर

हालात देख कर मेरी तहरीर देख कर
रोने लगे वो दर्द की तफ़्सीर देख कर

ए काश तुझ में इतना समां जाऊं के हर इक
पहचान लें मुझे तेरी तस्वीर देख कर

उठती है आँख बारहा देहलीज़ की तरफ
अटका हुआ हैं दम तेरी ताख़ीर देख कर

ख्वाबो से दिल को होती थी तस्कीन जिस क़दर
उतना ही डर गयी हूँ मैं ताबीर देख कर

रहती हैं जिनकी दोस्तो तदबीर पर निगाह
चलते नहीं हैं वो कभी तक़दीर देख कर

मुझको बदलते वक़त का एहसास हो गया
हैरान हूँ मैं अपनी ही तस्वीर देख कर

जो उम्र मेरी खास थी ख्वाबों में कट गयी
करना भी क्या है अब मुझे ताबीर देख कर

मंज़िल तो सामने है मगर क्या करें सिया
बैठे हुए हैं पांव की ज़ंजीर देख कर

डर डर कर यूँ रोज़ मरें क्यूँ

-इस दुनिया से और डरें क्यूँ
डर डर कर यूँ रोज़ मरें क्यूँ
दिल है जब ख़ुशियों से ख़ाली
अश्कों से फिर नैन भरें क्यों
तुमको पाया ही कब हमने
खोने का अफ़सोस करें क्यूँ
पत्थर जैसी हैं जो यादें
उनका दिल पर बोझ धरें क्यूँ
फरज़ानो की बाते सुन कर
खुद को पागल और करें क्यूँ